Ramakrishna Paramahamsa Jayanti 2026: भारत की आध्यात्मिक परंपरा में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनका प्रभाव समय और सीमाओं से परे है। ऐसे ही महान संतों में से एक थे रामकृष्ण परमहंस। उनकी जयंती हर वर्ष बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह दिन केवल एक जन्मदिन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, सेवा और मानवता के संदेश को याद करने का अवसर होता है।

आइए विस्तार से जानते हैं कि रामकृष्ण परमहंस जयंती 2026 कब है, क्यों मनाई जाती है, उनका जीवन परिचय क्या है, और उनके विचार आज भी क्यों प्रासंगिक हैं।
रामकृष्ण परमहंस जयंती 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार रामकृष्ण जयंती फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि बृहस्पतिवार, 19 फरवरी 2026 को पड़ेगी।
द्वितीया तिथि 18 फरवरी 2026 को शाम 4:57 बजे से शुरू होकर 19 फरवरी 2026 को दोपहर 3:58 बजे तक रहेगी। इसलिए जयंती 19 फरवरी को मनाई जाएगी।
आने वाले वर्षों में:
- 2027 में रामकृष्ण जयंती 10 मार्च को
- 2028 में 27 फरवरी को मनाई जाएगी
साल 2026 में यह उनकी 190वीं जन्म वर्षगाँठ होगी, जो विशेष महत्व रखती है।
रामकृष्ण परमहंस जयंती क्यों मनाई जाती है?
रामकृष्ण परमहंस जयंती इस महान संत और आध्यात्मिक गुरु का जन्मदिन (जयंती) मनाने के लिए मनाई जाती है। यह दिन उनके जीवन, शिक्षाओं, उपदेशों और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को याद करने और सम्मान देने का अवसर होता है, विशेषकर उनके अनुयायियों और रामकृष्ण मिशन से जुड़े लोगों के लिए।
उन्होंने मानवता को यह सिखाया कि सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। उनका प्रसिद्ध संदेश था — “यतो मत, ततो पथ” अर्थात जितने मत, उतने पथ। यानी ईश्वर तक पहुँचने के कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है।
इस दिन देशभर में उनके अनुयायी और रामकृष्ण मिशन के केंद्र विशेष पूजा, भजन, सत्संग और समाज सेवा के कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
रामकृष्ण परमहंस का जीवन परिचय (Biography)
रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कामारपुकुर (कमरपुकुर) गांव में हुआ था। उनका मूल नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। कहा जाता है कि उनके माता-पिता (खुदीराम चट्टोपाध्याय और चंद्रमणी देवी) ने उनके जन्म से पहले कई अलौकिक अनुभव किए थे, जिससे यह संकेत मिला कि बालक असाधारण होगा।
बचपन से ही गदाधर का मन पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा भक्ति और आध्यात्मिक चिंतन में लगता था। वे घंटों ध्यान में लीन रहते और भक्ति-भाव में डूब जाते थे।
दक्षिणेश्वर काली मंदिर से जुड़ाव
सन 1855 में वे कोलकाता के प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी बने। यहाँ उन्होंने माँ काली की गहन साधना की। वे माँ काली को साक्षात् ईश्वर का रूप मानते थे और उनके प्रति उनका प्रेम अद्भुत था।
लोगों का मानना था कि वे सीधे ईश्वर से संवाद करते थे। उनकी साधना इतनी गहरी थी कि उन्हें “परमहंस” की उपाधि दी गई। परमहंस का अर्थ है — वह व्यक्ति जिसने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया हो।
स्वामी विवेकानंद के गुरु
रामकृष्ण परमहंस के जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय था उनका अपने शिष्य स्वामी विवेकानंद से मिलना। विवेकानंद (तब नरेंद्रनाथ दत्त) पहले तर्कवादी विचारों के थे, लेकिन रामकृष्ण के सान्निध्य में आकर उन्हें आध्यात्मिक सत्य का अनुभव हुआ।
रामकृष्ण ने विवेकानंद को न केवल आध्यात्मिक शिक्षा दी, बल्कि उन्हें मानव सेवा का संदेश भी दिया। आगे चलकर विवेकानंद ने 1893 में विश्व धर्म सम्मेलन में भारत की आध्यात्मिक धरोहर को विश्व मंच पर स्थापित किया और रामकृष्ण के विचारों को वैश्विक पहचान दिलाई।
बाद में वर्ष 1897 में विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ और मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्यालय बेलूर मठ में स्थित है।
रामकृष्ण परमहंस के विचार और दर्शन
रामकृष्ण परमहंस के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 19वीं सदी में थे। उन्होंने कभी जटिल भाषा का प्रयोग नहीं किया। वे सीधी, सरल और दिल को छू लेने वाली बातें करते थे।
सभी धर्मों की एकता
उन्होंने कहा कि हर धर्म ईश्वर तक पहुँचने का एक मार्ग है। उन्होंने स्वयं विभिन्न धर्मों की साधना कर यह अनुभव किया कि सभी का लक्ष्य एक ही है। आज जब समाज में मतभेद और धार्मिक टकराव देखने को मिलते हैं, तब उनका यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
मन की शुद्धता पर जोर
उनका कहना था कि जैसे गंदे दर्पण में सूर्य का प्रतिबिंब साफ नहीं दिखता, वैसे ही अशुद्ध मन में ईश्वर का अनुभव नहीं हो सकता। इसलिए व्यक्ति को पहले अपने मन और विचारों को पवित्र बनाना चाहिए।
सेवा ही सच्ची भक्ति
रामकृष्ण का मानना था कि जब तक देश की जनता भूखी और पीड़ित है, तब तक केवल पूजा-पाठ से काम नहीं चलेगा। मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है। यही विचार आगे चलकर रामकृष्ण मिशन के कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
समाज पर उनका योगदान
रामकृष्ण परमहंस केवल संत ही नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने जाति-पांति और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने महिलाओं और गरीबों के प्रति सम्मान और करुणा का भाव रखने की शिक्षा दी।
उनकी प्रेरणा से स्थापित रामकृष्ण मिशन आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यह संस्था बिना किसी भेदभाव के मानव सेवा को ही अपना धर्म मानती है।
रामकृष्ण परमहंस का निधन
16 अगस्त 1886 को मात्र 50 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। हालांकि उनका शारीरिक जीवन छोटा रहा, लेकिन उनके विचार और शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को प्रेरित कर रही हैं।
आज के समय में रामकृष्ण जयंती का महत्व
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग तनाव, असुरक्षा और विभाजन की भावना से जूझ रहे हैं, तब रामकृष्ण परमहंस का संदेश हमें शांति, प्रेम और एकता का मार्ग दिखाता है।
रामकृष्ण जयंती हमें यह याद दिलाती है कि:
- धर्म का असली उद्देश्य मानवता की सेवा है
- ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम और करुणा से होकर जाता है
- सच्ची आध्यात्मिकता जीवन में सरलता और विनम्रता लाती है
यदि हम उनके विचारों को अपने जीवन में थोड़ा सा भी अपनाएं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
रामकृष्ण परमहंस जयंती 2026, 19 फरवरी को मनाई जाएगी। यह दिन केवल एक संत के जन्म की याद नहीं, बल्कि उनके महान विचारों और मानवता के संदेश को पुनः जीवित करने का अवसर है।
रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन से यह साबित किया कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जीव में बसता है। उनका जीवन, उनका त्याग, और उनके विचार हमें सिखाते हैं कि प्रेम, सेवा और एकता ही सच्चे धर्म के मूल तत्व हैं।
इस रामकृष्ण जयंती पर आइए हम भी संकल्प लें कि उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं और समाज में सद्भाव और करुणा का संदेश फैलाएं।













