Ramakrishna Paramahamsa Vichar: इस साल 19 फरवरी 2026 को रामकृष्ण परमहंस जयंती मनाई जा रही है। यह दिन केवल एक संत के जन्म का स्मरण नहीं, बल्कि उनकी दिव्य शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का अवसर भी है। 1836 में जन्मे और 1886 में देह त्याग करने वाले रामकृष्ण परमहंस उन महान संतों में गिने जाते हैं जिन्होंने आध्यात्मिक अनुभव को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीकर दिखाया।

‘परमहंस’ वह कहलाता है जिसने आध्यात्मिक साधना के द्वारा परम सत्य का अनुभव कर लिया हो। रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ईश्वर को प्रत्यक्ष अनुभव किया और यह संदेश दिया कि ईश्वर को पाया जा सकता है — यदि भक्ति सच्ची हो और मन निर्मल हो।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे रामकृष्ण परमहंस के सुविचार, रामकृष्ण परमहंस के उपदेश, रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएं और उनकी अमृतवाणी, जो आज भी जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
रामकृष्ण परमहंस के अनमोल सुविचार, उपदेश, शिक्षाएं, अमृतवाणी,
“यतो मत, ततो पथ” (जितने मत, उतने पथ)
“जब तक ‘मैं’ है, तब तक भगवान नहीं।”
“सत्य ही भगवान है।”
शिव ज्ञाने जीव सेवा”
“खराब दर्पण में सूर्य का प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता, उसी तरह गंदे मन में भगवान का प्रकाश नहीं उतरता।”
केवल “भांग” कहने से नशा नहीं होता, उसे सेवन करना पड़ता है।
यदि एक बार गोता लगाने से मोती न मिले, तो इसका अर्थ यह नहीं कि समुद्र में मोती नहीं हैं।
1. ईश्वर एक है, मार्ग अनेक – धर्मों की एकता का संदेश
रामकृष्ण परमहंस का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी संदेश था – “सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।” उनका मानना था कि भगवान तक पहुँचने के रास्ते भले अलग-अलग हों, लेकिन मंजिल एक ही है।
वे कहते थे कि जैसे अलग-अलग नदियाँ अंत में समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही अलग-अलग धर्म अंततः एक ही परमात्मा तक पहुँचाते हैं। यह विचार आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब समाज को एकता और सहिष्णुता की सबसे अधिक आवश्यकता है।
उनका प्रसिद्ध कथन था:
“यतो मत, ततो पथ” (जितने मत, उतने पथ)
यह वाक्य उनके विचारों का सार माना जाता है।
रामकृष्ण परमहंस के सुविचार हमें सिखाते हैं कि किसी भी धर्म का अपमान करने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि हर आस्था अपने तरीके से ईश्वर तक पहुँचने का प्रयास है।
2. अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है
रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएं स्पष्ट कहती हैं कि जब तक मनुष्य के भीतर ‘मैं’ है, तब तक ‘वह’ (ईश्वर) नहीं मिल सकता। वे अहंकार को माया का रूप मानते थे। उनका एक प्रसिद्ध विचार है —“जब तक ‘मैं’ है, तब तक भगवान नहीं।”
आज के समय में जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों, धन और पद पर गर्व करता है, तब यह शिक्षा हमें भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। यदि हम अपने अहंकार को थोड़ा कम कर दें और विनम्रता अपनाएँ, तो रिश्तों में भी मधुरता आएगी और मानसिक शांति भी मिलेगी।
3. सत्य ही ईश्वर है – झूठ से दूरी जरूरी
रामकृष्ण परमहंस की अमृतवाणी में सत्य को विशेष स्थान दिया गया है। वे कहते थे कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए सत्य बोलना और सत्य पर चलना अनिवार्य है।
उनका मानना था कि “सत्य ही भगवान है।” यदि व्यक्ति झूठ, छल और कपट में लिप्त रहेगा, तो वह आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता।
आज के प्रतिस्पर्धी जीवन में कई बार लोग छोटे-छोटे झूठ को सामान्य मान लेते हैं। लेकिन रामकृष्ण परमहंस के उपदेश बताते हैं कि सत्य का मार्ग भले कठिन हो, पर अंततः वही स्थायी सुख देता है।
4. जीव ही शिव है – नि:स्वार्थ सेवा का महत्व
रामकृष्ण परमहंस का प्रसिद्ध सिद्धांत था – “शिव ज्ञाने जीव सेवा” (अर्थ: जीवों में शिव को जानकर सेवा करना) की भावना रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं से उत्पन्न मानी जाती है, लेकिन यह वाक्य विशेष रूप से उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद द्वारा अधिक व्यवस्थित रूप से प्रतिपादित और लोकप्रिय किया गया।
रामकृष्ण स्वयं कहते थे: “जीव ही शिव है” (अर्थात प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का निवास है)। वे मनुष्य में ईश्वर-दर्शन की बात करते थे। बाद में स्वामी विवेकानंद ने इसे व्यावहारिक वेदांत के रूप में समाजसेवा के सिद्धांत में विकसित किया।
आज अगर हम समाज में थोड़ी करुणा और सेवा की भावना जोड़ दें — जैसे भूखे को भोजन, जरूरतमंद को सहारा, दुखी को सांत्वना — तो यही सच्ची भक्ति होगी।
5. मन की सफाई भी उतनी ही जरूरी
रामकृष्ण परमहंस मन को ‘लोटे’ (पात्र) की तरह बताते थे। जैसे बर्तन को रोज साफ करना पड़ता है, वैसे ही मन को भी रोज साधना, ध्यान और अच्छे विचारों से शुद्ध करना जरूरी है।
उनका कहना था —“खराब दर्पण में सूर्य का प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता, उसी तरह गंदे मन में भगवान का प्रकाश नहीं उतरता।”
यदि मन में ईर्ष्या, क्रोध और द्वेष भरा होगा, तो शांति संभव नहीं। इसलिए रोज थोड़ी देर ध्यान, प्रार्थना या सकारात्मक चिंतन करने से मन धीरे-धीरे निर्मल होता है।
6. केवल नाम लेने से नहीं, सच्ची भक्ति से मिलते हैं भगवान
श्रीश्री रामकृष्ण कथामृत (अंग्रेज़ी: The Gospel of Sri Ramakrishna) में रामकृष्ण परमहंस का एक बेहद सरल और प्रभावशाली उदाहरण है —“भांग का नशा केवल ‘भांग-भांग’ कहने से नहीं होता, उसे पीना पड़ता है।” अर्थ यह कि केवल भगवान का नाम जपने से नहीं, बल्कि सच्चे मन से भक्ति करने से ही ईश्वर का अनुभव होता है।
आज हम कई बार पूजा-पाठ तो करते हैं, लेकिन मन कहीं और भटकता रहता है। उनकी शिक्षाएं कहती हैं कि यदि प्रेम और तड़प सच्ची हो, तो ईश्वर की कृपा अवश्य मिलती है।
7. मेहनत करते रहो – एक गोता काफी नहीं
रामकृष्ण परमहंस का एक और प्रेरक विचार है —“यदि एक बार गोता लगाने से मोती न मिले, तो इसका अर्थ यह नहीं कि समुद्र में मोती नहीं हैं।”
यह संदेश केवल आध्यात्मिक जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि करियर, शिक्षा और रिश्तों के लिए भी उतना ही लागू होता है। असफलता का अर्थ यह नहीं कि प्रयास छोड़ दिया जाए। निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी है।
8. कामिनी-कंचन से सावधान
रामकृष्ण परमहंस अक्सर सांसारिक आकर्षण — विशेषकर “कामिनी-कंचन” (अर्थात् स्त्री-आसक्ति/इंद्रिय-भोग और धन-लोभ) को आध्यात्मिक साधक के लिए प्रमुख बाधा बताते थे। उनकी वार्ताओं के संकलन श्रीश्री रामकृष्ण कथामृत (The Gospel of Sri Ramakrishna) में यह अभिव्यक्ति बार-बार मिलती है।
उनके अनुसार “काम” (वासना) और “कंचन” (स्वर्ण/धन) मन को ईश्वर से दूर कर देते हैं यदि उनसे आसक्ति हो।
इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार या काम छोड़ देना चाहिए, बल्कि मन में वैराग्य रखना चाहिए। वे कहते थे: “हाथ काम में, मन भगवान में।”
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यदि हम संतुलन बनाए रखें और लालच को सीमित रखें, तो जीवन अधिक शांत और संतुलित बन सकता है।
स्वामी विवेकानंद पर श्रीरामकृष्ण देव के विचारों (शिक्षाओं) का प्रभाव
रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य थे स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने उनके संदेश को विश्वभर में पहुँचाया। विवेकानंद ने गुरु की शिक्षा — मानव सेवा और आध्यात्मिक एकता — को आधुनिक भाषा में प्रस्तुत किया और भारत की आध्यात्मिक पहचान को नई ऊँचाई दी।
यह इस बात का प्रमाण है कि रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएं केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं थीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण से भी जुड़ी थीं।
जीवन में कैसे लाएँ पॉजिटिव चेंज?
यदि हम रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ छोटे बदलाव करें —
- सत्य बोलें
- अहंकार कम करें
- सेवा भाव रखें
- मन को सकारात्मक विचारों से भरें
- सभी धर्मों का सम्मान करें
तो धीरे-धीरे हमारे भीतर शांति, संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ेगा। यही वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति है।
रामकृष्ण परमहंस केवल एक संत नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना के उज्ज्वल स्तंभ थे। उनकी अमृतवाणी, सुविचार, और उपदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 19वीं सदी में थे।
अगर हम उनके बताए मार्ग — प्रेम, सत्य, सेवा और विनम्रता — को अपनाएँ, तो निश्चित ही जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।
सच्ची भक्ति, निर्मल मन और नि:स्वार्थ कर्म — यही है रामकृष्ण परमहंस की असली सीख।
इस जयंती पर संकल्प लें कि उनके कम से कम एक विचार को अपने जीवन में जरूर उतारेंगे। बदलाव छोटा होगा, लेकिन असर गहरा और स्थायी होगा।














